चीन की ख़ुद की ज़रूरत क्या उसे भारत के क़रीब ला रही है?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
इस महीने की शुरुआत में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित एससीओ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने के पहले से ही ये कयास लगने लगे थे कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आ सकते हैं.
12 सितंबर को शी जिनपिंग ने ब्रिक्स की 18वीं बैठक के लिए नई दिल्ली पहुंचकर इन कयासों को सच साबित कर दिया.
ये पिछले सात सालों में जिनपिंग की पहली भारत यात्रा है.
15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख़ की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में नरमी के संकेत तब मिले थे जब पीएम मोदी 2025 में एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने चीन पहुंचे थे.
सवाल ये है कि गलवान झड़प के बाद बढ़ी कड़वाहट के बाद ऐसा क्या हुआ कि जिनपिंग भारत आने के लिए तैयार हो गए.
विशेषज्ञों का कहना है इस सवाल का जवाब दुनिया के तेज़ी से बदलते जियोपॉलिटिकल हालात और चीन की अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों में छिपा है.
सीमा पर भले ही चीन और भारत कड़े प्रतिद्वंद्वी हों लेकिन व्यापार के मोर्चे पर वो बड़े कारोबारी साझेदार हैं.
सीमा पर आमने-सामने लेकिन व्यापार में साझेदार

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भारत और चीन की सेनाओं के बीच कई बार तनाव रहा है लेकिन आपसी व्यापार पर इसकी छाप नहीं पड़ी है.
दोनों देशों के बीच 151.5 अरब डॉलर का व्यापार होता है. हालांकि 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बहुत बड़ा है. अब ये बढ़कर 112.16 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का हो गया है.
भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाएं काफ़ी हद तक चीनी तकनीक तक उसकी पहुंच पर निर्भर होती जा रही हैं.
यह आंकड़ा बताता है कि स्मार्टफ़ोन से लेकर टेलीकॉम नेटवर्क तक, इलेक्ट्रॉनिक्स की असेंबलिंग तक के लिए भारत चीनी कलपुर्ज़ों पर कितना निर्भर है. भारत का दवा उद्योग भी चीन पर काफ़ी निर्भर है और इसमें इस्तेमाल होने वाले ज़्यादातर एपीआई चीन से आयात किए जाते हैं.
दूसरी ओर, चीन भारत को अपने सामान के लिए बड़े मार्केट के तौर पर देखता है. 2025 में भारत में 15 करोड़ से भी ज़्यादा स्मार्टफ़ोन बिके. इनमें से 90 फ़ीसदी स्मार्टफ़ोन या उनके कलपुर्ज़े चीन से आयात किए गए थे. शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी मोबाइल कंपनियों के लिए भारतीय बाज़ार सोने की खान साबित हुए हैं.
चीन की नज़र भारत के कार मार्केट पर लगी हुई है, जहां 2025 में 45 लाख कारें बिकी हैं. साल 2020 से पहले भारत के स्टार्ट-अप ईकोसिस्टम में चीनी कंपनियों ने अरबों डॉलर लगाए थे
चीन के अलीबाबा ग्रुप और टेनसेंट होल्डिंग्स ने पेटीएम, ज़ोमैटो, ओला इलेक्ट्रिक और बाईजूज़ में भी काफ़ी फ़ंडिंग की थी.
लेकिन 2020 की झड़पों के बाद भारत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई चीनी कंपनियों के निवेश को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया. वहीं चीन ने अपनी कंपनियों को भारत को रेयर अर्थ मैटेरियल, कारें बनाने के लिए मैग्नेट और दूसरी चीज़ें बेचने से रोकने की कोशिश की थी.
विशेषज्ञों का कहना है इस बीच, जियोपॉलिटिकल हालात तेज़ी से बदले. ट्रंप के टैरिफ़ और अमेरिका-ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया में बिज़नेस सेंटिमेंट को बड़ा झटका दिया.
ईरान युद्ध ने बढ़ाईं चीन की मुश्किलें

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2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने जब चीन पर टैरिफ़ लगाए, तब चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही धीमी विकास दर और बेरोज़गारी से जूझ रही थी.
फिर भी, इसने मज़बूती दिखाई, निर्यात को बढ़ावा दिया और लगभग पांच फ़ीसदी विकास दर हासिल की.
लेकिन देश के अंदर आर्थिक असंतोष बढ़ता जा रहा है.
चीन एक निर्यातक देश और उसके पास सामानों का सरप्लस है. लेकिन ईरान युद्ध के बाद दुनिया भर में सामान की मांग घटी है और पूरी दुनिया का सप्लायर चीन के लिए अपने सामान को खपाना मुश्किल हो रहा है.
चीन पर नज़र रखने वाले पत्रकारों का मानना है की चीन ट्रेड सरप्लस देश भले ही है लेकिन देश के अंदर सामान की मांग नहीं है.
चीन की ये समस्या उसकी अर्थव्यवस्था को धीमा कर रही है. और यहीं पर उसे भारत के बाज़ार की ज़रूरत है. भारत की 140 करोड़ की आबादी पहले से ही उसके लिए बड़ा मार्केट रही है और इस बाज़ार का दायरा लगातार बढ़ रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तेज़ी से बढ़ रही है उसमें चीन के सामान को खपाने की संभावना भी बढ़ रही है.
भारत सरकार की पहली तिमाही की 7.8 फ़ीसदी ग्रोथ के मुक़ाबले दूसरी छमाही में चीन की 4.7 फ़ीसदी की ग्रोथ रेट काफ़ी कम है. इसलिए चीन के लिए भारतीय बाज़ार की ग्रोथ काफी मायने रखती है.
चीन किस संकट में फंसा है?

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धीमी होती अर्थव्यवस्था को देखते हुए चीन ने हाल में अपने आठ सरकारी बैंकों और इंश्योरेंस कंपनियों को लगभग 54 अरब डॉलर की नक़द मदद देने का फ़ैसला किया है ताकि फ़ाइनेंशियल सिस्टम मज़बूत हो और कंज़्यूमर डिमांड बढ़े.
बीबीसी संवाददाता लॉरा बिकर ने अपनी एक रिपोर्ट में चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था की मुश्किलों का ज़िक्र किया है.
वो लिखती हैं, ''140 करोड़ से ज़्यादा लोगों की आबादी वाले इस देश में एक विशाल घरेलू मार्केट है लेकिन इसकी दिक़्क़त ये है कि आर्थिक हालात अनिश्चित होने के बावजूद लोग पैसा ख़र्च करना नहीं चाहते. चीन में घरेलू खपत की स्थिति ख़राब है. चीन के पास निर्यात के लिए पर्याप्त सामान है लेकिन देश के अंदर मांग बढ़ाने के मामले में वो कमज़ोर दिख रहा है.''
''इसकी वजह अमेरिका के साथ चीन का ट्रेड वॉर नहीं बल्कि इसके अंदरूनी आर्थिक हालात हैं. मिसाल के तौर पर चीन का भारी-भरकम हाउसिंग सेक्टर ध्वस्त हो गया है. एक समय में सस्ते क़र्ज़ की वजह से मज़बूत हुआ चीन का हाउसिंग सेक्टर अब ओवर सप्लाई का शिकार हो गया है. दूसरी ओर लोगों की जेब में पैसे नहीं हैं. हालात ये हैं कि चीन की पूरी आबादी भी देश भर के सभी ख़ाली अपार्टमेंटों को नहीं भर पाएगी.''
लॉरा बिकर की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन के स्टेट्स्टिक्स ब्यूरो के पूर्व उप प्रमुख हे केंग ने दो साल पहले स्वीकार किया था कि फ़िलहाल 3 अरब लोगों के लिए पर्याप्त ख़ाली घर हैं.
लॉरा बिकर लिखती हैं कि मध्यमवर्गीय चीनी परिवारों को केवल मकानों की क़ीमतों की ही चिंता नहीं है.
''उन्हें इस बात की चिंता है कि क्या सरकार उन्हें पेंशन दे पाएगी. अगले दशक में, लगभग 3 करोड़ लोग, जिनकी उम्र वर्तमान में 50 से 60 वर्ष के बीच है, चीनी वर्कफ़ोर्स से बाहर हो जाएगी. सरकारी स्वामित्व वाली चीनी सामाजिक विज्ञान अकादमी के 2019 के अनुमान के अनुसार, सरकारी पेंशन कोष 2035 तक समाप्त हो सकता है.''
''वो लिखती हैं कि लोगों को इस बात को लेकर भी चिंताएं हैं कि उनके बेटे-बेटियों और नाती-पोतों को नौकरी मिल पाएगी या नहीं, क्योंकि लाखों ग्रेजुएट नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.''
अगस्त 2023 में प्रकाशित आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चीन के शहरी क्षेत्रों में 16 से 24 वर्ष की उम्र के पांच में से एक से अधिक व्यक्ति बेरोज़गार हैं. सरकार ने तब से युवा बेरोज़गारी के आंकड़े जारी नहीं किए हैं.
समस्या यह है कि चीन रातों-रात बदलाव करके अमेरिका को सामान बेचने से लेकर स्थानीय ख़रीदारों को सामान बेचने की ओर नहीं बढ़ सकता.
चीन का ट्रेड सरप्लस और भारत का बाज़ार

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भारत में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ईस्ट एशियन स्टडीज़ डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अरविंद येलेरीकहते हैं कि गलवान झड़प के बाद भी चीन ने भारत के साथ क़ारोबार जारी रखा.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''गलवान के बाद भारत के प्रतिबंधों के जवाब में वो भी प्रतिक्रिया में कड़े प्रतिबंध लगा सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया. 2022, 2023, 2024 में चीन का भारत के साथ व्यापार लगातार बढ़ा है. चीन को ये अच्छी तरह पता है कि उसके टियर टू और टियर थ्री कारोबारी भारत के साथ व्यापार करते हैं और इससे उसके घरेलू मार्केट में पैसा आएगा. घरेलू मांग बढ़ाने में इससे काफ़ी मदद मिलेगी.''
वो कहते हैं, ''चीन के यूरोप और अमेरिका के साथ कारोबारी रिश्ते काफ़ी अच्छे रहे हैं. लेकिन 2017-18 के बाद वहां के बाज़ार में चीन के लिए संभावनाएं उतनी अच्छी नहीं रह गई हैं.''
अरविंद येलेरी कहते हैं, ''भारत अपने व्यापार को डाइवर्सिफ़ाई करना चाहता है लेकिन चीन को उसकी सीमाओं और संभावनाओं के बारे में पता है. इसलिए वो चाहता है कि भारत उस पर निर्भर रहे. इसलिए वो एक बंधे-बंधाए ग्राहक को भड़काना नहीं चाहता है. भारत के साथ जिस तरह से उसका व्यापार बढ़ रहा है उस हिसाब से ये अगले पांच-सात साल में 200 अरब डॉलर तक भी पहुंच सकता है.''
वो कहते हैं, ''चीन भारत के साथ एक दीर्घकालिक रणनीति पर भी काम कर रहा है. वो कारोबारी मोर्चे पर सहयोग बढ़ाकर जियोपॉलिटिकल और पॉलिटिकल मोर्चे पर भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करना चाहता है.''
अरविंद येलेरी कहते हैं, ''चीन के पास भरपूर सरप्लस है. लेकिन सामान बनाने की लागतें लगातार बढ़ रही हैं. माल बनकर पड़ा है और घरेलू बाज़ार में मांग नहीं है. चीन चाहता है कि सरप्लस मार्केट को वर्ल्ड मार्केट में खपाया जाए और फिर पैसा घरेलू बाज़ार में मांग बढ़ाने में इस्तेमाल किया जाए. इसलिए उसे भारत जैसे विशाल बाज़ार वाले देश की ज़रूरत है.''
कारोबार जारी रहेगा और दांव-पेच भी
पिछले साल, भारत और चीन ने सीधी उड़ानें फिर शुरू की थीं. भारत ने चीनी बिज़नेस प्रोफे़शनलों के लिए वीज़ा प्रक्रिया आसान की थी. फिर भी भारत और चीन के बीच कारोबारी प्रतिद्वंद्विता इतनी आसानी से ख़त्म नहीं होगी.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा, ''चीन के अली पे को भारत के तत्काल भुगतान सिस्टम से जोड़ने के प्रस्ताव को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया गया है. चीन के एंट ग्रुप से जुड़ी इस पेमेंट सर्विस के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के कारण रोका गया है.''
भारत सरकार एसएफ़आईओ की उस सिफ़ारिश पर भी विचार कर रही है, जिसमें चीनी मोबाइल कंपनी शाओमी के ख़िलाफ़ विस्तृत जांच की बात कही गई है.
इसी बीच, रॉयटर्स को एक भारतीय सूत्र ने बताया कि चीनी अधिकारियों ने कंपनियों से भारत को अहम तकनीक और बुनियादी ढांचा उपलब्ध न कराने को कहा है.
इनमें बंदरगाहों के उपकरण, सोलर पैनल और मोबाइल फ़ोन बनाने के लिए ज़रूरी उपकरण शामिल हैं. हालांकि रॉयटर्स ने जब चीन के वाणिज्य मंत्रालय से इस पर टिप्पणी करने को कहा उसने इससे इनकार कर दिया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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