'जौहर यूनिवर्सिटी गिराई गई तो हमारा क्या होगा?', बुलडोज़र चलाने के आदेश से चिंता में स्टूडेंट

प्रदर्शन करती छात्राएं

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    • Author, प्रेरणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रामपुर से
  • प्रकाशित
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उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की रहने वाली इकरा का परिवार नहीं चाहता था कि वह क़ानून की पढ़ाई करे. उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने माता-पिता को इसके लिए मनाया.

कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की जानकारी लेने के बाद आख़िरकार उनके परिवार ने उत्तर प्रदेश के रामपुर ज़िले की जौहर यूनिवर्सिटी में उनका दाख़िला कराया.

इकरा कहती हैं, "उन्हें इस यूनिवर्सिटी का माहौल सुरक्षित लगा, इसलिए मेरा दाख़िला यहां हो पाया. मैं बहुत खुश थी, लेकिन अब हर समय डर लगा रहता है. रातों की नींद उड़ गई है. समझ नहीं आता आगे क्या होगा. डर है कि अगर यूनिवर्सिटी गिरा दी गई तो घर वाले मुझे वापस बुला लेंगे, घर के कामों में लगा देंगे और मेरी शादी कर देंगे."

इन दिनों इस डर के साथ केवल इकरा नहीं जी रही हैं. पैरामेडिकल की छात्राएं फ़राह और दिशा, क़ानून की छात्रा लाब्या समेत जौहर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली तमाम छात्राओं को फ़िलहाल यही चिंता सता रही है कि अगर यूनिवर्सिटी गिरा दी गई, तो उनके भविष्य का क्या होगा?

यही वजह है कि जिस दिन प्रशासन ने यह आदेश जारी किया कि जौहर यूनिवर्सिटी के 40 में से 38 भवनों को ध्वस्त किया जाएगा, इसके बाद से यूनिवर्सिटी के छात्र धरने पर बैठे हैं. छात्रों का कहना है कि वे तब तक बैठे रहेंगे, जब तक प्रशासन अपना फ़ैसला वापस नहीं ले लेता.

विश्वविद्यालय प्रशासन के मुताबिक़, मौजूदा वक़्त में तीन हज़ार छात्र यहां पढ़ रहे हैं. क़रीब 100 टीचिंग और इतने ही क़रीब नॉन-टीचिंग स्टाफ़ कार्यरत हैं. ऐसे में चिंता केवल छात्रों में नहीं है, कर्मचारियों के सामने भी रोज़गार छिन जाने का संकट खड़ा है.

यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट परचेज़ ऑफ़िसर मसूद-उल-हसन कहते हैं, "जितने भी स्टाफ़ के लोग हैं, सब बेचैन और परेशान हैं. हर किसी को अपने भविष्य, अपने मुस्तकबिल के बारे में दिख रहा है कि अगर भगवान न करे, यूनिवर्सिटी को कुछ हो जाता है, तो उन्हें काफ़ी दिनों तक परेशानियां उठानी पड़ सकती हैं."

वहीं असिस्टेंट लाइब्रेरियन सना का कहना है कि उनकी रातों की नींद चली गई है.

वह कहती हैं, "हम सब परेशान हैं. सारे स्टाफ़ ने शांतिपूर्ण मार्च भी निकाला है. यूनिवर्सिटी के गार्ड, माली, शिक्षक सभी अनिश्चितता में हैं, पर उम्मीद है कि प्रशासन अपना फ़ैसला वापस लेगा."

क्यों लिया गया यूनिवर्सिटी ध्वस्त करने का फ़ैसला

ध्वस्तीकरण के आदेश का विरोध करते छात्र

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बीती 15 जुलाई को रामपुर विकास प्राधिकरण ने दावा किया कि जौहर यूनिवर्सिटी के 40 में से 38 भवनों का निर्माण बिना स्वीकृत नक़्शा पास कराए किया गया है. ऐसे में अगले पंद्रह दिनों के भीतर या तो विश्वविद्यालय प्रशासन ख़ुद इन भवनों को ध्वस्त कर दे या फिर निर्धारित अवधि के बाद प्राधिकरण ख़ुद इन भवनों को गिरा देगा.

जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह यूजीसी से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय है और संबंधित नियामक संस्थाओं से मंज़ूरी मिलने के बाद ही इन इमारतों में अलग-अलग प्रोफ़ेशनल कोर्सेज़ चलाए जा रहे हैं. इन्हें अब अवैध बताकर कैसे गिराया जा सकता है?

जौहर विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ज़हीरुद्दीन

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बीबीसी से बात करते हुए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर ज़हीरुद्दीन ने कहा, "यह संस्थान सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद ही अस्तित्व में आया. इसे यूजीसी से मान्यता मिली, राज्य सरकार के क़ानून के तहत इसकी स्थापना हुई और बाद में इसे अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा भी दिया गया. तब से यहां पढ़ाई और दूसरे शैक्षणिक कामकाज नियमित रूप से चल रहे हैं."

वह आगे कहते हैं, "यहां पैरामेडिकल, फ़ार्मेसी, नर्सिंग और क़ानून जैसे कई प्रोफ़ेशनल कोर्सेज़ पढ़ाए जाते हैं. इन सभी कोर्सेज़ की अपनी-अपनी नियामक संस्थाएं हैं, जैसे बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया और नर्सिंग काउंसिल आदि. जब भी ये संस्थाएं मान्यता देने आती हैं, तो वे परिसर का निरीक्षण करती हैं. वे देखते हैं कि इमारतें मानकों के अनुरूप हैं या नहीं, कक्षाओं और प्रयोगशालाओं की क्या व्यवस्था है, छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं. इन सभी मानकों को पूरा करने के बाद ही मान्यता दी जाती है. ऐसे में हमें समझ नहीं आता कि अब सीधे इमारतों को गिराने का आदेश कैसे दिया जा सकता है?"

'राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप'

आज़म ख़ान

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इमेज कैप्शन, रामपुर की मोहम्मद जौहर अली यूनिवर्सिटी की नींव क़रीब दो दशक पहले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने रखी थी
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रामपुर की मोहम्मद जौहर अली यूनिवर्सिटी की नींव क़रीब दो दशक पहले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने रखी थी. आज़म ख़ान तब रामपुर के विधायक थे. अलग-अलग मौकों पर उन्होंने इस यूनिवर्सिटी को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताया है.

ऐसे में ध्वस्तीकरण के इस आदेश को समाजवादी पार्टी के नेता उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बता रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के विधायकों के एक डेलिगेशन ने रामपुर के ज़िलाधिकारी से मुलाक़ात कर इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, "इस शासनादेश के आधार पर बीजेपी सरकार चाहे तो बदले की भावना छोड़कर जौहर यूनिवर्सिटी का नक़्शा भी आसानी से एक दिन में पास करा सकती है. बीजेपी अपने लोगों के लिए इस शासनादेश को मानती है, लेकिन किसी और के लिए इसे इस्तेमाल न करके हर समाज के छात्रों और उनके परिवार वालों के ख़िलाफ़ नाइंसाफ़ी कर रही है. इसी जीओ के आधार पर बीजेपी सरकार ने हज़ारों भवनों को नियमित करके उन्हें वैध स्वरूप प्रदान किया है. बीजेपी बहाना न बनाए, शिक्षा के मंदिर को बचाए!"

आज़म ख़ान की पत्नी ने क्या कहा?

आज़म ख़ान की पत्नी तज़ीन फ़ातिमा

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वहीं पूर्व सांसद और आज़म ख़ान की पत्नी तज़ीन फ़ातिमा का कहना है कि जिस गांव में यूनिवर्सिटी स्थापित हुई, वह वर्ष 2023 तक रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के अधीन थी ही नहीं.

वह दावा करती हैं, "हमसे कोई चूक नहीं हुई है. हमारे ऊपर इल्ज़ाम लगाया गया है. रामपुर विकास प्राधिकरण को तो इस मामले में कुछ बोलने का अधिकार ही नहीं है. 2006 में जब यूनिवर्सिटी की संग-ए-बुनियाद रखी गई थी, उस वक़्त सिंगनखेड़ा गांव, जिस गांव में यूनिवर्सिटी स्थित है, वह आरडीए की परिधि में आता ही नहीं था. 2005 में आरडीए का पहला नोटिफ़िकेशन जब जारी हुआ, तब सिंगनखेड़ा उसकी लिस्ट में नहीं था. 2024 में जब दूसरा नोटिफ़िकेशन जारी हुआ, तब जाकर यह गांव आरडीए की परिधि में शामिल हुआ है. तो जब आरडीए था ही नहीं, तो नक़्शा किससे पास करवाते?"

मगर प्रशासन इन दलीलों से सहमत नहीं है. उसका कहना है कि जैसे दो भवनों का नक़्शा ज़िला पंचायत से पास करवाया गया, वैसे ही बाकी भवनों के नक़्शे भी पास क्यों नहीं कराए गए.

रामपुर के ज़िलाधिकारी अजय द्विवेदी के मुताबिक़, "स्पष्ट है कि उन्हें नियम-क़ानूनों की जानकारी थी, पर इसके बावजूद 38 भवनों के नक़्शे स्वीकृत नहीं कराए गए. इसलिए आरडीए ने ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया है."

'ध्वस्त करने के बजाए जुर्माना लगा दे सरकार'

जौहर विश्वविद्यालय की एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग. यह उन दो भवनों में शामिल है जिसका नक्शा पास होने का दावा प्रशासन कर रहा है.

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इमेज कैप्शन, जौहर विश्वविद्यालय की एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग. यह उन दो भवनों में शामिल है जिसका नक्शा पास होने का दावा प्रशासन कर रहा है

इस बीच कुछ विपक्षी नेताओं ने ध्वस्तीकरण के बजाय सरकार से दूसरे विकल्पों पर विचार करने की बात कही है.

कांग्रेस सांसद शशि थरूर का कहना है कि अगर निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो क़ानून के मुताबिक़ जुर्माना लगाया जा सकता है या दूसरी कार्रवाई की जा सकती है, पर एक चलते-फिरते विश्वविद्यालय को ध्वस्त करना हज़ारों छात्रों के भविष्य को ध्वस्त करने जैसा है.

धरने पर बैठे छात्रों में से एक साक़िब इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. उनका कहना है कि छात्र भी यही मांग कर रहे हैं कि प्रशासन चाहे तो जुर्माना लगा दे. अगर विश्वविद्यालय प्रशासन इसे चुका पाने में असफल रहता है, तो हम छात्र मिलकर इसे चुकाने के लिए तैयार हैं. हमारे पूर्व छात्र और दूसरे लोग चंदा देकर इस यूनिवर्सिटी को बचाएंगे. किसी भी सूरत में इसे गिरने नहीं देंगे.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने ध्वस्तीकरण के आदेश के ख़िलाफ़ रामपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के समक्ष वैधानिक अपील दाख़िल की है. इस मामले में 28 अगस्त को सुनवाई होनी है. हमने इस मामले में मुरादाबाद मंडल के आयुक्त और रामपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष आन्जनेय कुमार सिंह से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

आन्जनेय कुमार सिंह और आज़म ख़ान

आन्जनेय कुमार सिंह

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आन्जनेय कुमार सिंह वहीं अफ़सर हैं, जिनके रामपुर जिलाधिकारी रहने के दौरान साल 2019 में आज़म ख़ान और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कई मामलों में प्रशासनिक कार्रवाइयां हुईं और मुक़दमे दर्ज हुए.

एक मामला तो सीधा आज़म ख़ान और आन्जनेय कुमार सिंह से जुड़ा है. दरअसल, 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान अपने एक विवादित भाषण में आज़म ख़ान ने आन्जनेय सिंह को ''तनख़ैया'' कहकर संबोधित किया था. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा है कि उन्होंने यह भी कहा था कि चुनाव जीतने के बाद वह अधिकारी से "जूते साफ़ कराएंगे". इस भाषण के बाद उनके ख़िलाफ़ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया था.

इस मामले में मई 2026 में रामपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने आज़म ख़ान को दो साल की सज़ा सुनाई थी. सज़ा के ख़िलाफ़ उन्होंने अपील दायर की, पर जुलाई 2026 में सेशन कोर्ट ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रहा.

जौहर विश्वविद्यालय

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रही बात यूनिवर्सिटी की तो जौहर विश्वविद्यालय के ख़िलाफ़ भी कई मामले दर्ज हुए. जैसे - यूनिवर्सिटी के विस्तार के लिए शत्रु संपत्ति को कथित तौर पर क़ब्ज़ाने का मामला, रामपुर की ऐतिहासिक राजा लाइब्रेरी से कथित तौर पर किताबें चुराकर यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में रखना, यूनिवर्सिटी परिसर में बनाई गई कृत्रिम झील के लिए सरकारी और किसानों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करने का आरोप और यूनिवर्सिटी विस्तार के लिए किसानों की ज़मीन कब्ज़ाने का आरोप. इन सभी मामलों में केस दायर हुए, कोर्ट में मामला चला. कुछ में स्टे लग गया तो कुछ की सुनवाई अभी भी कोर्ट में जारी है.

जिन किसानों के ज़मीन क़ब्ज़ाने का आरोप आज़म ख़ान पर है, उन्हीं में से कुछ किसानों से हमने बात की और प्रशासन के ताज़ा आदेश पर उनका रुख़ जानना चाहा.

यासीन

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इमेज कैप्शन, आज़म ख़ान पर जिन किसानों की ज़मीन कब्जाने के आरोप लगे हैं, उनमें यासीन भी शामिल हैं

यासीन कहते हैं, '' क़ब्ज़ाने का तो बेपनाह मामला है. जिस आदमी की ज़मीन ली जाती है, उसे यही लगता है कि अगर उसकी ज़मीन 500 की बिक रही है तो 1500 की बिके. ऐसा तो हुआ ही नहीं. सबकी ज़मीनें लीं, पर पैसे कम दिए. लेकिन आज सवाल जो ये यूनिवर्सिटी गिराने का है तो इससे तो सबका दिल ही दुखेगा. इतने बच्चे पढ़ रहे हैं, कई फ्री में पढ़ रहे हैं, कितने बच्चों को अलीगढ़ जाना पड़ता है, इतनी परेशानी उठानी पड़ती है. यहां तो घर में ही पढ़ लेते हैं.

वहीं दानिश कहते हैं, ''किसान ही नहीं भारत का कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी नहीं चाहेगा कि ये यूनिवर्सिटी गिराई जाए. शिक्षा के मंदिर बनाए जाते हैं, गिराए नहीं.''

UGC REPORT

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साल 2014 में विश्वविद्यालय का निरीक्षण करने वाली यूजीसी की विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में भी कहा था कि यूनिवर्सिटी की फीस राज्य की दूसरी प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ की तुलना में अपेक्षाकृत कम है और इसे केवल कॉमर्शियल प्रॉफिट यानी व्यावसायिक लाभ के उद्देश्य से संचालित होता हुआ नहीं पाया गया.

अक्षीर एलएलएम के छात्र हैं और 80 प्रतिशत विकलांग. उनका कहना है कि यूनिवर्सिटी की तरफ़ से उन्हें फ़ीस में 80 प्रतिशत की छूट दी गई है और वह मात्र 24 हज़ार रुपए में अपना कोर्स पूरा कर रहे हैं.

मोहम्मद इमरान बताते हैं कि उनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी और वह अपनी फीस जमा नहीं कर पा रहे थे. नियम कहते हैं कि परीक्षा से पहले आपकी सारी फीस जमा होनी चाहिए लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उनसे कहा कि वह एग्ज़ाम पर फोकस करें, फीस की चिंता न करें.

लायबा ने हमें बताया कि उन्हें यूनिवर्सिटी ने अपनी फीस में छूट की पॉलिसी से हटकर सहयोग किया. उनके पिता की तबीयत ख़राब चल रही थी और वह फीस जमा कर पाने में अक्षम थीं. इस स्थिति में यूनिवर्सिटी ने उनकी फीस माफ़ की और वह बिना किसी चिंता के पढ़ाई पर ध्यान लगा पाईं.

प्रशासन ने छात्रों के लिए काउंसलिंग सेंटर खुलवाए

यूनिवर्सिटी के बाहर की गेट. छात्रों का धरना स्थल.

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ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बीच प्रशासन ने यहां पढ़ने वाले छात्रों के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था की थी. इस व्यवस्था के तहत उन्हें ये बताया जा रहा था कि वह आगे की अपनी पढ़ाई कहां,कब और कैसे जारी रख सकते हैं.

लेकिन छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि आस-पास ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं है, जहां उन्हें इसी स्तर की सुविधाओं और इसी तरह के प्रोफ़ेशनल कोर्सेज़ के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखने का विकल्प मिल सके. उनका कहना है कि आस-पास ज़्यादातर डिग्री कॉलेज हैं.

फ़िलहाल यूनिवर्सिटी प्रशासन की शिकायत के बाद इस काउंसलिंग सेंटर को भी यहां से हटा दिया गया है.

मालूम हो कि उत्तर प्रदेश का रामपुर, साक्षरता के मामले में प्रदेश के सबसे पिछड़े ज़िलों में से एक है.

छात्रा

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बीते तीन-चार दिनों से जब हम यहां घूम रहे हैं, हर तबके के लोगों से बात कर रहे हैं, फिर चाहे वो इस फ़ैसले से प्रभावित लोग हों, अप्रभावित लोग हों, आज़म ख़ान के समर्थक हों या विरोधी...सबका यही मानना है कि किसी चलते-फिरते शिक्षण संस्थान को गिराने का फ़ैसला कहीं से भी ठीक नहीं है और प्रशासन को अपने इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि उनके मुताबिक़ सवाल केवल भवन के नक्शे पास होने या न होने का नहीं है.

सवाल हज़ारों छात्रों के भविष्य, सैकड़ों कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी और उन परिवारों की उम्मीद का है...जो उन्होंने यहां पढ़ने वाले अपने बच्चों से लगा रखी है.

और सवाल उन बेटियों का भी है जिन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने घरवालों को पढ़ाई के लिए राज़ी किया, पर अब उन्हें अपनी तालीम अधूरी छूट जाने का डर सता रहा है.

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