यूपी में एसआईआर की जिन गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग है निशाने पर

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, लखनऊ
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रदेश का पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र चर्चा में है.
यहाँ एक ही एपिक (ईपीआईसी) नंबर या आम भाषा में कहें तो वोटर आईडी नंबर पर अलग-अलग व्यक्तियों का विवरण दिखाई देने की शिकायत सामने आई है.
मामले की जांच में उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने भी मतदाता सूची में अनियमितताएं मिलने की बात कही है और संबंधित अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
पर बात यहाँ तक पहुँची कैसे?
दरअसल, 21 अक्तूबर को लखनऊ स्थित कांग्रेस दफ़्तर में पार्टी की नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा, यूपी चुनाव प्रभारी राजेंद्र गौतम और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत समेत अन्य नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की.
इसमें कांग्रेस नेताओं ने पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के आरोप लगाए.
पार्टी का दावा था कि प्रदेश में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने और 10 अप्रैल को अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच 13,150 मतदाताओं के नाम बदल दिए गए.
जबकि उनके एपिक नंबर और मतदाता सूची के क्रमांक (सीरियल) वही रहे, जो ड्राफ़्ट सूची में थे.
मसलन, जिस ईपीआईसी नंबर पर पहले किसी व्यक्ति का नाम दर्ज था, बाद में उसी नंबर पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दिखाई देने का आरोप लगा.
एपिक नंबर, वोटर आईडी कार्ड पर दर्ज एक खास पहचान संख्या होती है. आम भाषा में इसे वोटर आईडी नंबर भी कहते हैं.
यह अंकों और नंबरों से बना ऐसा एक यूनिक अल्फ़ान्यूमेरिक कोड होता है जो चुनाव के दौरान उस वोटर को पहचानने और वेरिफ़ाई करने में मदद करता है.
ऐसे में एक ही एपिक नंबर पर किसी दूसरे व्यक्ति का विवरण दिखाई देना गंभीर सवाल खड़े करता है.
कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि प्रभावित नामों में बड़ी संख्या मुस्लिमोंकी है. पार्टी ने पीलीभीत सदर में 804 मतदाताओं के नाम हटाए जाने और 2,600 नए नाम जोड़े जाने का भी आरोप लगाया.
इन आरोपों के बाद चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठे. लेकिन मामला सिर्फ़ राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहा.
आयोग की अपनी जांच में भी पीलीभीत जिले की सदर विधानसभा की मतदाता सूची में अनियमितताएं सामने आईं.
पीलीभीत मामले में कांग्रेस ने कहा है कि वह दूसरे विधानसभा क्षेत्रों की वोटर लिस्ट भी जांच रही है. पार्टी ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे रद्द करने की मांग की है.
समाजवादी पार्टी भी यूपी की कई विधानसभाओं में वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट नामों और दूसरी गड़बड़ियों का हवाला देकर व्यापक जांच की मांग कर रही है.
आयोग की जांच में क्या सामने आया?
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 22 अक्तूबर को इन गड़बड़ियों पर एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की. जिसमें वोटर लिस्ट में नाम-पता सुधार संबंधी फ़ॉर्म-8 से जुड़ा स्पष्टीकरण दिया गया.
जिसमें बताया गया, ''पीलीभीत सदर विधानसभा में मई से अगस्त के बीच (यानी फ़ाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद) कुल 13,779 फ़ॉर्म-8 दर्ज किए गए थे.
इनमें 10,470 को स्वीकृत कर लिया गया और 3,309 फॉर्म रिजेक्ट हो गए. लेकिन न तो ऑनलाइन और न ही ऑफ़लाइन फ़ॉर्म के रिकॉर्ड उपलब्ध मिले. हमने स्वीकार हुए 10,470 फॉर्म और उसके बाद हुई अपडेटेड एंट्री को जांचा और उनमें गड़बड़ियां पाईं."
प्रेस नोट में लिखा है, "इसके लिए वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर के कंप्यूटर असिस्टेंट और मई से अगस्त के बीच पीलीभीत सदर में तैनात निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ को दोषी पाया गया है. कंप्यूटर सहायक को सेवा समाप्ति के आदेश दिए गए हैं, जबकि ईआरओ के ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने के निर्देश हैं.''
अब आयोग के पक्ष को आसान भाषा में समझते हैं.
दरअसल, एसआईआर के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने या पहले से दर्ज जानकारी में बदलाव के लिए अलग-अलग फॉर्म इस्तेमाल होते हैं.
फॉर्म-6: वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए भरा जाता है.
फॉर्म-7: अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि वोटर लिस्ट में किसी का नाम नहीं होना चाहिए, तो वह उसे हटाने के लिए इस फॉर्म के ज़रिए आपत्ति दर्ज करा सकता है. हालांकि, नाम हटाने से पहले संबंधित अधिकारी को जांच करनी होती है.
फॉर्म-8: जिन लोगों का नाम पहले से वोटर लिस्ट में है, वे अपने नाम, उम्र, पता या दूसरी जानकारियों में सुधार कराने के लिए कर सकते हैं.
आमतौर पर सिस्टम में इन फॉर्म की एंट्री डेटा ऑपरेटर्स, वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर के कंप्यूटर असिस्टेंट या फिर उस काम के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति करता है.
पीलीभीत में जिन 13,779 फॉर्म-8 की एंट्री की बात आयोग कर रहा है, वह उसके मुताबिक़ कंप्यूटर असिस्टेंट ने की थी.
आगे की प्रक्रिया के तहत आवेदन की जांच के बाद संबंधित निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ईआरओ इसे मंज़ूरी देते हैं.
लेकिन इस मामले में आयोग की जांच के मुताबिक़, 13,779 फॉर्म-8 एंट्रियों से जुड़े रिकॉर्ड मिले ही नहीं.
प्रशासन ने सभी 10,470 स्वीकृत आवेदनों की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं.
बीबीसी ने अपनी जांच में क्या पाया
बीबीसी ने भी अपने स्तर पर भी कुछ विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की जांच की. इस दौरान हमें भी ऐसे कई उदाहरण मिले, जिनमें एक ही नाम और उससे संबंधित डीटेल अलग-अलग ईपीआईसी नंबरों पर दर्ज था.
(हमारे पास एपिक नम्बर के डिटेल हैं लेकिन निजी जानकारी के वजह से इसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है.)
जैसे- बरेली विधानसभा क्षेत्र-124 की मतदाता सूची में बांके की छावनी स्थित मतदान केंद्र पर एक ही महिला का नाम दो अलग-अलग ईपीआईसी नंबरों पर दर्ज मिला. नाम के अलावा उम्र, रिश्तेदार का नाम, सारी जानकारियां मेल खाती हैं.
इसी मतदान केंद्र की सूची में एक दूसरी महिला मतदाता का विवरण भी दो अलग-अलग ईपीआईसी नंबरों पर दर्ज मिला. दोनों एंट्री में उम्र और रिश्तेदार, बाकी दूसरी जानकारियां एक जैसी मिलती हैं.
पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में भी एक महिला का नाम तीन अलग-अलग ईपीआईसी नंबरों पर दर्ज मिला. तीनों एंट्री में उम्र , रिश्तेदार का नाम और मतदान केंद्र एक जैसे ही दर्ज है. ऐसे और दूसरे उदाहरण भी हैं.
हमने इस मामले में पक्ष जानने के लिए पीलीभीत के उपजिलानिर्वाचन अधिकारी से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की, मगर बात नहीं हो सकी.
सॉफ़्टवेयर की भूमिका पर भी सवाल

इमेज स्रोत, INC-Uttarpradesh/Facebook
कांग्रेस ने मतदाता सूची में बदलाव के लिए इस्तेमाल होने वाले चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर की भूमिका पर भी सवाल उठाए.
पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि ईआरओ समेत ज़िला स्तर के अधिकारियों ने सॉफ़्टवेयर तक पहुंच न होने की शिकायत की थी.
उन्होंने चुनाव आयोग के टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर विभाग की प्रमुख का नाम लेते हुए सवाल किया कि "अगर स्थानीय अधिकारियों के पास सिस्टम का पूरा एक्सेस नहीं था, तो पीलीभीत में मतदाताओं के विवरण में बदलाव किसने किए और किसके नियंत्रण में किए गए?"
कांग्रेस के इन आरोपों पर अब तक आयोग की प्रतिक्रिया नहीं आई है.
लेकिन प्रदेश में मतदाता सूची से जुड़ी गड़बड़ियों के आरोप सिर्फ़ पीलीभीत तक सीमित नहीं हैं.
एपिक नंबर सेम होने को लेकर आयोग का पक्ष
पिछले साल 2025 में एक जैसे एपिक नंबरों के मुद्दे पर चुनाव आयोग ने कहा था कि अलग-अलग राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में पुरानी विकेंद्रीकृत व्यवस्था के कारण कुछ वोटरों को समान एपिक नंबर एलॉट हुए.
आयोग के मुताबिक, ऐसे मामलों में मतदाताओं के नाम, पते, विधानसभा क्षेत्र और मतदान केंद्र अलग-अलग होते हैं, इसलिए वे केवल अपने निर्धारित बूथ पर ही वे वोट कर सकते हैं.
हालांकि, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले की एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक ही एपिक नंबर पर अलग-अलग व्यक्तियों की एंट्रीज़ जैसे सवाल पर आयोग की ओर से स्पष्ट टिप्पणी सामने नहीं आई है.
सपा ने उठाया वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट एंट्रीज़ का मुद्दा

इमेज स्रोत, Samajwadi Party/Facebook
इससे पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी मतदाता सूची में डुप्लीकेट एंट्रीज़ का मुद्दा उठाया था.
पार्टी ने दावा किया कि उसने प्रदेश की 100 विधानसभा सीटों की अंतिम मतदाता सूचियों की जांच की और एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक जगह दर्ज होने के उदाहरण पाए.
समाजवादी पार्टी ने डुप्लीकेट वोटर्स के मामले में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में सात पन्नों का ज्ञापन सौंपा है और सभी 403 विधानसभा सीटों की वोटर लिस्ट की जांच की मांग की है.
जिसके बाद बीती 19 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने शिक़ायत पर ऐक्शन भी लिया.
उन्होंने ज़िला निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए कि बीएलओ के ज़रिए ऐसे मामलों की पहचान की जाए और नियमों के मुताबिक़ फॉर्म-7 के ज़रिए डुप्लीकेट नाम हटाने की कार्रवाई हो.
उन्होंने यह भी कहा कि जांच में अधिकारियों की लापरवाही मिलने पर कार्रवाई की जाएगी.
इसके बाद सोशल मीडिया पर जब कुछ पत्रकारों ने डुप्लीकेशन का मामला उठाया, तब आयोग ने अपनी सफ़ाई में कहा कि उनकी जांच जारी है.
उदाहरण के लिए, फ़ैक्ट चेकर पत्रकार जुबैर अहमद ने सवाल किया कि एसआईआर पूरी होने के बाद भी वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट एंट्रीज़ क्यों हैं, जबकि इसी कमी को ख़त्म करना एसआईआर का मुख्य मकसद बताया गया था. साथ ही उन्होंने वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग पर भी सवाल किया.
इस पर यूपी सीईसी के आधिकारिक एक्स हैंडल से बताया गया कि ये दोनों शिकायतें उन्हें राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों से मिल चुकी हैं और डुप्लिकेट नाम हटाने का काम जारी है.
मामला शुरू कहां से हुआ?
वैसे तो विपक्षी पार्टियां एसआईआर की प्रक्रिया पर लंबे समय से सवाल उठाती रही हैं, लेकिन ताज़ा विवाद 6 अक्तूबर को द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक रिपोर्ट के बाद तेज़ हुआ.
'द मिस्टिरियस 16.18 लाख वोटर्स ऐडेड टू यूपी रोल' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि यूपी की फ़ाइनल वोटर लिस्ट में 84.3 लाख नए वोटर जोड़े गए, जबकि मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर फॉर्म-6 के सिर्फ़ 71.38 लाख आवेदनों का ब्योरा था.
रिपोर्ट के मुताबिक़, चुनाव आयोग ने 16.18 लाख ऐसे फॉर्म-6 आवेदनों का भी ज़िक्र किया था, जिनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं थी.
बीबीसी स्वतंत्र तौर पर रिपोर्टर्स कलेक्टिव के इन दावों की पुष्टि नहीं करता.

इमेज स्रोत, Getty Images
इसके अगले दिन, 7 अक्तूबर को यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने सफ़ाई देते हुए कहा कि ये 16.18 लाख आवेदन एसआईआर के दौरान बीएलओ ने उन एलिजिबल लोगों से जमा कराए थे, जिनके नाम मौजूदा वोटर लिस्ट में नहीं थे.
उन्होंने कहा कि नियमों के मुताबिक़ वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाने वाला ब्योरा उपलब्ध था और प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं हुई.
हालांकि, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी अगली रिपोर्ट में आवेदनों का ब्योरा सार्वजनिक करने के नियमों को लेकर आयोग की सफ़ाई पर सवाल उठाए.
आयोग लगातार अपने ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब एक्स प्लेटफ़ॉर्म पर दे रहा है.
यूपी एमएलसी चुनाव- वोटरलिस्ट के अजीबोगरीब नामों पर बीजेपी भी बोली, जांच के आदेश
प्रदेश में 23 अक्तूबर को 11 एमएलसी सीटों पर चुनाव हुए, इससे पहले ही इस वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठने लगे थे.
इस बार समाजवादी पार्टी के साथ-साथ बीजेपी ने भी शिकायतें कीं. ये शिकायतें ऐसे वोटरों के असामान्य नामों और अन्य जानकारियों से जुड़ी थीं. सोशल मीडिया पर भी एमएलसी चुनाव की कुछ वोटर स्लिप्स सामने आईं, जिसमें कुछ नाम ऐसे थे, जिनका कोई मतलब नहीं निकलता.
मसलन, एक वोटर का नाम 'टक्कर मारना' और दूसरे का नाम 'राम ने यादव को मारा' दर्ज था. कहीं वोटर के पिता के नाम की जगह 'मूर्ख चंद्र यादव' और कहीं 'बीकॉम' लिखा मिला. कुछ वोटरों ने पोलिंग बूथ अपने घर से काफी दूर दिए जाने की शिकायत भी की.
इन शिकायतों पर यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने जांच के निर्देश दिए. 23 अक्तूबर को उन्होंने बताया कि एमएलसी चुनावों की वोटर लिस्ट में 14.81 लाख एंट्रीज़ में से 158 में गड़बड़ियां मिली हैं.
आयोग के मुताबिक़, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के दौरान नामों को अंग्रेज़ी से हिंदी में लिखने वाले सॉफ्टवेयर ने कुछ मामलों में नाम को उसी तरह लिखने के बजाय उसका अर्थ ही हिंदी में बदल दिया.
इसी वजह से 'रामहित यादव' जैसे नाम का अनुवाद 'राम ने यादव को मारा' हो गया. आयोग ने इसके लिए सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी और कर्मचारियों की लापरवाही, दोनों को ज़िम्मेदार माना और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा.
साथ ही कहा कि मामूली लिखने या प्रिंटिंग की गलतियों के कारण किसी वोटर को वोट डालने से नहीं रोका जाएगा, बशर्ते उसकी पहचान तय हो सके.
टाइमलाइन- यूपी एसआईआर
27 अक्तूबर, 2025- यूपी में एसआईआर की शुरुआत हुई.
6 जनवरी, 2026- ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी, ड्राफ्ट में 12,55,56,025 मतदाता दर्ज थे.
10 अप्रैल, 2026- फाइनल वोटर लिस्ट जारी. फाइनल लिस्ट में 13,39,84,792 मतदाता दर्ज हुए. ड्राफ्ट लिस्ट के मुकाबले क़रीब 84.29 लाख बढ़े.
12 नवंबर से 11 दिसंबर- एसएसआर के तहत वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने, हटाने या विवरण ठीक कराने के लिए दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी.
4 जनवरी, 2027- एसएसआर के बाद फ़ाइनल लिस्ट जारी होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.




























