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ब्रिक्स से क्या भारत को फ़ायदा हो रहा है? जानिए, विशेषज्ञों के बीच है कैसी चर्चा
भारत चौथी बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है. लेकिन इस समय इस समूह की अगुआई करना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से काफ़ी जटिल है.
ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने के क़रीब दो महीने बाद ही अमेरिका और इसराइल ने ब्रिक्स सदस्य ईरान पर हमला कर दिया.
इसके बाद तेहरान ने भी ब्रिक्स के सदस्य यूएई और सऊदी अरब पर जवाबी हमले किए. अब भारत के सामने इन तीनों देशों को एक ही मंच पर साथ लाने की चुनौती है.
अमेरिका-ईरान युद्ध ने ब्रिक्स के भीतर के गंभीर मतभेदों को सामने ला दिया है. मई में भारत की मेज़बानी में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के ख़त्म हो गई.
इसे भारत के लिए एक कूटनीतिक नाकामी की तरह देखा गया. मध्य-पूर्व के संकट से कैसे निपटा जाए, इस पर समूह के सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी.
अब आशंका है कि आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भी बिना संयुक्त बयान के ख़त्म हो सकता है.
अगर ऐसा हुआ तो मेज़बान देश भारत के लिए इसे फिर से कूटनीतिक नाकामी के रूप में देखा जाएगा. भारत हर हाल में इससे बचना चाहेगा.
2021 में जब भारत ने पिछली बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी, तब यह सिर्फ़ पाँच देशों का समूह था, ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका.
इन्हीं देशों के नाम के पहले अक्षरों से ब्रिक्स बना है.
आज यह 11 देशों का एक जटिल समूह बन चुका है. हालांकि, सऊदी अरब की औपचारिक सदस्यता की स्थिति को लेकर स्पष्टता नहीं होने के कारण इसे 10 सदस्यीय समूह भी माना जाता है.
जब समूह में सिर्फ़ भारत और चीन के बीच मतभेद थे, तब भी आम सहमति बनाना मुश्किल था. अब ब्रिक्स में ऐसे देश भी शामिल हैं, जो एक-दूसरे के ख़िलाफ़ सीधे सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि जिस गुट में आम सहमति बहुत मुश्किल है, वहाँ भारत को क्या हासिल होता है?
ब्रिक्स से चीन का हित सधेगा?
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर राजेश राजगोपाल मानते हैं कि भारत अब भी वैश्विक राजनीति में बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहा है, जबकि वह रास्ता काफ़ी हद तक उसके पैरों तले से खिसक चुका है.
प्रोफ़ेसर राजगोपाल ने द प्रिंट में 11 सितंबर को प्रकाशित एक लेख में कहा है, ''समस्या का एक हिस्सा इस हक़ीक़त को पहचानने में नाकामी भी है. ब्रिक्स इसकी एक अच्छी मिसाल है. अगर ब्रिक्स कभी एक प्रभावी समूह बनता है, तो इसकी पूरी संभावना है कि चीन इसका इस्तेमाल अपने हितों को आगे बढ़ाने, भारत को अलग-थलग करने और इंडो-पैसिफिक में भारत के मुख्य साझेदारों को कमज़ोर करने के लिए करेगा.''
''भारत को इस कोशिश में बहुत कम दिलचस्पी होनी चाहिए, ख़ासकर इसलिए क्योंकि चीन के मुक़ाबले अपनी अपेक्षाकृत कमज़ोर स्थिति के कारण उसे इन्हीं साझेदारों की ज़रूरत है. इसलिए भारत के हित में यही है कि वह जहाँ तक संभव हो ब्रिक्स को कमज़ोर करे, ताकि यह ऐसा शक्तिशाली तंत्र न बन जाए जो भारतीय हितों को कुचल दे. अब इस समस्या से बचने का कोई रास्ता नहीं है.''
प्रोफ़ेसर राजगोपाल ने लिखा है, ''यह सब पहले से ही अनुमान लगाया जा सकता था. चीन जो करने की कोशिश कर रहा है, वही बड़ी शक्तियां हमेशा से करती आई हैं. अंतरराष्ट्रीय समूहों और संस्थाओं का इस्तेमाल अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए.''
''यह सोचना मूर्खता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का कोई ऐसा हित होता है, जो उनके सदस्य देशों के हितों से ऊपर हो. न ही उनके फ़ैसले और कार्रवाइयां अलग-अलग और परस्पर विरोधी राष्ट्रीय हितों के किसी राजनीतिक समायोजन का नतीजा होती हैं. बल्कि इन प्रक्रियाओं में शामिल देशों की वास्तविक शक्ति का अंतर इन फ़ैसलों को गहराई से प्रभावित करता है. दूसरे शब्दों में, इन समूहों पर अधिक शक्तिशाली देशों का नियंत्रण होता है.
राजगोपाल कहते हैं, ''क़रीब दो दशक पहले जब ब्रिक्स की स्थापना हुई थी, तब आर्थिक और सैन्य शक्ति का यह अंतर इतना बड़ा नहीं था. इसके अलावा, अमेरिकी शक्ति के हाथों में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण से पैदा हुई संभावित समस्याओं ने भी शायद ब्रिक्स के भीतर शक्ति के असंतुलन से ध्यान हटा दिया था. लेकिन यह उस स्पष्ट हक़ीक़त से आंखें मूंदने का कोई बहाना नहीं है. भारत को सबसे ज़्यादा इस हक़ीक़त पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है.''
भारत के लिए चुनौतियां
हालांकि राजेश राजगोपाल की तरह फ़्रांस में भारत के राजदूत रहे मोहन कुमार नहीं सोचते हैं.
मोहन कुमार ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू में 12 सितंबर को लिखा है कि ब्रिक्स बना रहेगा और धीरे-धीरे लेकिन लगातार अपने सदस्य देशों को दो प्रमुख लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा. ये दो लक्ष्य हैं, अपने रणनीतिक विकल्पों को बढ़ाना और वैश्विक राजनीति को वास्तव में बहुध्रुवीय दुनिया की दिशा में आगे बढ़ाना.
मोहन कुमार कहते हैं, ''ये दोनों भारत की विदेश नीति के बुनियादी सिद्धांत भी हैं. जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता से भरी दुनिया में दूसरे देश भी इन सिद्धांतों पर आधारित विदेश नीति अपनाने में बड़ी संभावनाएं देख रहे हैं. ब्रिक्स के पास विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के लिहाज से दिखाने के लिए काफ़ी कुछ होगा. सीधे शब्दों में कहें तो ब्रिक्स अब इतना बड़ा हो चुका है कि न तो इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है और न ही इसके विफल होने की गुंजाइश है.''
''अगर ब्रिक्स के लिए कोई एक सावधानी ज़रूरी है, तो वह यह है कि उसे ऐसी जियोपॉलिटिकल हलचलों में फँसने से बचना चाहिए, जिन्हें उसने ख़ुद पैदा नहीं किया है और जिनका उसके सदस्यों के लिए निश्चित रूप से कोई रणनीतिक महत्व भी नहीं है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं पर सबकी नज़र हो सकती है, और ऐसा होना भी चाहिए. लेकिन बड़ी तस्वीर यह है कि ब्रिक्स समूह अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप काम करे. दिल्ली शिखर सम्मेलन को इस दिशा में ठोस प्रगति करनी चाहिए.''
कज़ाख़स्तान के अल्माटी स्थित सुलेमान डेमिरेल यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफ़ेसर राज कुमार शर्मा ने निक्केई एशिया से कहा कि भारत एक मज़बूत ब्रिक्स चाहता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि यह समूह चीन के रणनीतिक प्रभाव का औजार बन जाए.
उन्होंने कहा, "इससे नई दिल्ली के सामने एक मुश्किल संतुलन बनाने की चुनौती पैदा होती है."
उन्होंने कहा कि चौथी बार ब्रिक्स की मेज़बानी में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई दिल्ली ख़ुद को कई स्तरों पर "ब्रिज बिल्डर" के रूप में किस तरह स्थापित करती है.
ब्रिक्स का विस्तार 2025 में पेश की गई चीन की ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव के साथ हुआ है, जो एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देती है.
चीनी नेता इस पहल को "वर्चस्ववादी राजनीति" के ख़िलाफ़ क़दम और विकासशील देशों के बीच शक्ति के अधिक न्यायसंगत बँटवारे की कोशिश के तौर पर पेश करते हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि भारत का मुख्य लक्ष्य ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी समूह बनाना नहीं है, बल्कि इसे अधिक प्रतिनिधित्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक विश्वसनीय मंच के रूप में मज़बूत करना है, साथ ही वैश्विक स्तर पर नई दिल्ली की प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थिति को और मज़बूत करना है.
इसी साल जनवरी महीने में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि ब्रिक्स का सदस्य होने के बावजूद भारत पश्चिम-विरोधी नहीं है. उन्होंने कहा था कि कई क्षेत्रों में पश्चिम भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार है.
जयशंकर ने कहा था कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अमेरिका और रूस, दोनों के साथ समान रूप से मज़बूत संबंध रख सकता है.
ब्रिक्स और अमेरिका
ब्रिक्स की स्थापना 2006 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन ने की थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हुआ. अब इसमें 10 देश शामिल हैं, जिनकी संयुक्त अर्थव्यवस्था दुनिया की कुल जीडीपी का क़रीब एक चौथाई हिस्सा है.
अफ़्रीकी महाद्वीप से इथियोपिया और मिस्र इसके सदस्य हैं, जबकि ईरान, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात भी इस सूची में शामिल हैं.
ब्रिक्स ने ख़ुद को तेज़ी से उन पश्चिमी नेतृत्व वाले समूहों के मुक़ाबले एक संतुलनकारी ताक़त के तौर पर पेश किया है, जो लंबे समय से वैश्विक एजेंडा तय करते रहे हैं.
समूह ने आईएमएफ़ जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की मांग की है और अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं के ज़्यादा इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है.
ब्रिक्स की इन पहलों से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार नाराज़ हुए हैं. पिछले साल उन्होंने ब्रिक्स देशों पर टैरिफ़ बढ़ाने की धमकी दी थी.
भारत ने इस शिखर सम्मेलन की मेज़बानी का बहुत ज़ोर शोर से प्रचार नहीं किया था.
यह बैठक इस बात की परीक्षा होगी कि क्या ब्रिक्स अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट और ठोस क़दम उठा सकता है, जो वैश्विक व्यवस्था को सार्थक रूप से प्रभावित कर सकें.
ब्रिक्स के मौजूदा अध्यक्ष भारत ने कहा है कि उसका फोकस सदस्य देशों के बीच सहयोग और नीतिगत समन्वय को गहरा करने के साथ वैश्विक अनिश्चितता, सप्लाई चेन में मुश्किलें, जलवायु जोखिम और कई अन्य चुनौतियों से निपटने की उनकी क्षमता को मज़बूत करने पर होगा.
मध्य पूर्व और यूक्रेन में जारी युद्ध वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं. ऊर्जा, उर्वरक के साथ खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन रहे हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से विकास और बड़े पैमाने पर रोज़गार ख़त्म होने की इसकी संभावित आशंका भी एक बड़ी चुनौती है.
अमेरिका और चीन एआई को समर्थन देने वाली तकनीक और बुनियादी ढांचे के विकास में सबसे आगे हैं, जबकि कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के और पीछे छूट जाने का ख़तरा है. बढ़ता जलवायु संकट भी एक बड़ी चिंता का विषय होगा.
ब्रिक्स के सदस्य देशों के हितों में काफ़ी अंतर है और कई बार ये हित एक-दूसरे से टकराते भी हैं.
उनकी आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां भी एक-दूसरे से बहुत अलग हैं. ऐसे में कई विवादित मुद्दों पर आम सहमति बनाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है.
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